*INSPIRING STORIES BY OTHERS

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MILAREPA

(Tibetan Sadguru)

Baba then described the Tibetan Sadguru Milarepa, who lived 900 years before (1025–1135):

He was the son of a rich man, but when Milarepa was [seven years old], his father died; and as often happens, his uncle raped his mother and stole the family fortune. The mother, in her hatred, asked her son to learn black magic to take revenge and ruin the uncle. The boy, while still young, learned the black arts to take revenge. He succeeded in mastering the destructive forces of nature and destroyed his uncle and his family and many others with a fierce storm. After the violent deed was done, he sat and wondered why he had done such a murderous thing. As he was an advanced soul, naturally he felt bad at having done such a foul thing for worldly purposes.

To repent, he took his black magic books and went in search of a Master. [He met the Guru Rongton, who sent him to Marpa.] After great difficulties, he found his Master, Marpa. Milarepa was 38. He had nothing but his books to offer in exchange for wanting God. Marpa took him on as his servant for six years but gave him no food, and after a strenuous day's work, Milarepa had to go to the village and beg. Milarepa was given near impossible difficult tasks, such as building a small hut of stones with his bare hands. When completed, the Master Marpa would have the whole structure torn down on one pretext or another.

In this way, he would be harassed continuously; but Milarepa stayed on in the service of his Master, obeying his every word and so became the dust at Marpa's feet. After several years of such miseries, one day the Sadguru, pleased with his disciple's love and obedience, gave him God-realization in a moment, and afterwards Milarepa became a Perfect Master himself.

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WHO IS TULSI (तुलसी कौन थी)

तुलसी(पौधा) पूर्व जन्म मे एक लड़की थी जिस का नाम वृंदा था, राक्षस कुल में उसका जन्म हुआ था बचपन से ही भगवान विष्णु की भक्त थी. बड़े ही प्रेम से भगवान की सेवा, पूजा किया करती थी. जब वह बड़ी हुई तो उनका विवाह राक्षस कुल में दानव राज जलंधर से हो गया। जलंधर समुद्र से उत्पन्न हुआ था.

वृंदा बड़ी ही पतिव्रता स्त्री थी सदा अपने पति की सेवा किया करती थी.

एक बार देवताओ और दानवों में युद्ध हुआ जब जलंधर युद्ध पर जाने लगे तो वृंदा ने कहा``` -

स्वामी आप युद्ध पर जा रहे है आप जब तक युद्ध में रहेगे में पूजा में बैठ कर``` आपकी जीत के लिये अनुष्ठान करुगी, और जब तक आप वापस नहीं आ जाते, मैं अपना संकल्प

नही छोडूगी। जलंधर तो युद्ध में चले गये, और वृंदा व्रत का संकल्प लेकर पूजा में बैठ गयी, उनके व्रत के प्रभाव से देवता भी जलंधर को ना जीत सके, सारे देवता जब हारने लगे तो विष्णु जी के पास गये।

सबने भगवान से प्रार्थना की तो भगवान कहने लगे कि – वृंदा मेरी परम भक्त है में उसके साथ छल नहीं कर सकता ।

फिर देवता बोले - भगवान दूसरा कोई उपाय भी तो नहीं है अब आप ही हमारी मदद कर सकते है।

भगवान ने जलंधर का ही रूप रखा और वृंदा के महल में पँहुच गये जैसे

ही वृंदा ने अपने पति को देखा, वे तुरंत पूजा मे से उठ गई और उनके चरणों को छू लिए, जैसे ही उनका संकल्प टूटा, युद्ध में देवताओ ने जलंधर को मार दिया और उसका सिर काट कर अलग कर दिया, उनका सिर वृंदा के महल में गिरा जब वृंदा ने देखा कि मेरे पति का सिर तो कटा पडा है तो फिर ये जो मेरे सामने खड़े है ये कौन है?

उन्होंने पूँछा - आप कौन हो जिसका स्पर्श मैने किया, तब भगवान अपने रूप में आ गये पर वे कुछ ना बोल सके, वृंदा सारी बात समझ गई, उन्होंने भगवान को श्राप दे दिया आप पत्थर के हो जाओ, और भगवान तुंरत पत्थर के हो गये।

सभी देवता हाहाकार करने लगे लक्ष्मी जी रोने लगे और प्रार्थना करने लगे यब वृंदा जी ने भगवान को वापस वैसा ही कर दिया और अपने पति का सिर लेकर वे

सती हो गयी।

उनकी राख से एक पौधा निकला तब

भगवान विष्णु जी ने कहा –आज से

इनका नाम तुलसी है, और मेरा एक रूप इस पत्थर के रूप में रहेगा जिसे शालिग्राम के नाम से तुलसी जी के साथ ही पूजा जायेगा और में

बिना तुलसी जी के भोग```

```स्वीकार नहीं करुगा। तब से तुलसी जी कि पूजा सभी करने लगे। और तुलसी जी का विवाह शालिग्राम जी के साथ कार्तिक मास में```

```किया जाता है. देव-उठावनी एकादशी के दिन इसे तुलसी विवाह के रूप में मनाया जाता है!

 

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PAST SANSKARAS (प्रारब्ध) 

     एक व्यक्ति हमेशा ईश्वर के नाम का जाप किया करता था । धीरे धीरे वह काफी बुजुर्ग हो चला था इसीलिए एक कमरे मे ही पड़ा रहता था ।

 

जब भी उसे शौच; स्नान आदि के लिये जाना होता था; वह अपने बेटो को आवाज लगाता था और बेटे ले जाते थे ।

 

धीरे धीरे कुछ दिन बाद बेटे कई बार आवाज लगाने के बाद भी कभी कभी आते और देर रात तो नहीं भी आते थे।इस दौरान वे कभी-कभी गंदे बिस्तर पर ही रात बिता दिया करते थे

 

अब और ज्यादा बुढ़ापा होने के कारण उन्हें कम दिखाई देने लगा था एक दिन रात को निवृत्त होने के लिये जैसे ही उन्होंने आवाज लगायी, तुरन्त एक लड़का आता है और बडे ही कोमल स्पर्श के साथ उनको निवृत्त करवा कर बिस्तर पर लेटा जाता है । अब ये रोज का नियम हो गया ।

 

एक रात उनको शक हो जाता है कि, पहले तो बेटों को रात में कई बार आवाज लगाने पर भी नही आते थे। लेकिन ये तो आवाज लगाते ही दूसरे क्षण आ जाता है और बडे कोमल स्पर्श से सब निवृत्त करवा देता है।

एक रात वह व्यक्ति उसका हाथ पकड लेता है और पूछता है कि सच बता तू कौन है? मेरे बेटे तो ऐसे नही हैं ।

 

अभी अंधेरे कमरे में एक अलौकिक उजाला हुआऔर उस लड़के रूपी ईश्वर ने अपना वास्तविक रूप दिखाया।

 

वह व्यक्ति रोते हुये कहता है: हे प्रभु आप स्वयं मेरे निवृत्ती के कार्य कर रहे है । यदि मुझसे इतने प्रसन्न हो तो मुक्ति ही दे दो ना ।

 

प्रभु कहते है कि जो आप भुगत रहे है वो आपके प्रारब्ध है। आप मेरे सच्चे साधक है; हर समय मेरा नाम जप करते है इसलिये मै आपके प्रारब्ध भी आपकी सच्ची साधना के कारण स्वयं कटवा रहा हूँ ।

 

व्यक्ति कहता है कि क्या मेरे प्रारब्ध आपकी कृपा से भी बडे है; क्या आपकी कृपा, मेरे प्रारब्ध नही काट सकती है ।

 

प्रभु कहते है कि, मेरी कृपा सर्वोपरि है; ये अवश्य आपके प्रारब्ध काट सकती है; लेकिन फिर अगले जन्म मे आपको ये प्रारब्ध भुगतने फिर से आना होगा । यही कर्म नियम है। इसलिए आपके प्रारब्ध मैं स्वयं अपने हाथो से कटवा कर इस जन्म-मरण से आपको मुक्ति देना चाहता हूँ ।

 

ईश्वर कहते है: *प्रारब्ध तीन तरह* के होते है:

 

*मन्द*, *तीव्र*, तथा *तीव्रतम*

 

*मन्द प्रारब्ध* मेरा नाम जपने से कट जाते है।

*तीव्र प्रारब्ध* किसी सच्चे संत का संग करके श्रद्धा और विश्वास से मेरा नाम जपने पर कट जाते है।

पर *तीव्रतम प्रारब्ध* भुगतने ही पडते है।

 

लेकिन जो हर समय श्रद्धा और विश्वास से मुझे जपते हैं; उनके प्रारब्ध मैं स्वयं साथ रहकर कटवाता हूँ और तीव्रता का अहसास नहीं होने देता हूँ ।

 

*प्रारब्ध पहले रचा, पीछे रचा शरीर ।*

 

*तुलसी चिन्ता क्यों करे, भज ले श्री रघुबीर।।*

 

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NOTHING IS PERMANENT IN THIS WORLD (जगत में कुछ भी परमानेंट नहीं है)

 भगवान बुद्ध एक बात अक्सर कहा करते थे कि *इस संसार में जिसे आप वास्तविक समझते हैं वह वास्तव में वास्तविक है नहीं ।।इस जगत में कुछ भी परमानेंट नहीं रहता है।।* लेकिन मनुष्य हर चीज पर अपनी मालकियत  दिखाता है ।।उदाहरण के लिए मनुष्य सोचता है कि वह उसकी पत्नी है,, वह उसका बच्चा है ,,वह उसकी घर है,, वह उसकी संपत्ति है,, वह उसकी जायदाद है ।।पर *बुद्ध कहते हैं कि जैसे-जैसे मनुष्य की चेतना विकसित होते जाती है वैसे वैसे उसकी समझ भी बढ़ती जाती है।। पत्नी तो वही रहती है, बच्चे भी वही रहते हैं पर मालकियत  वही नहीं रहती है।। संसार की क्षणभंगुरता जब दिखने लगती है तब हर चीज पर से मालकियत की भावना समाप्त होने लगती है।।* वैसे भी मालकियत  जमाना, किसी को अपने अधिकार में रखना बहुत गंदी बात है ।।यह एक प्रकार से हिंसा है।। यह निर्ममता है ।।

_जब हमें यह समझ में आ जाता है कि हम यहां जिस संसार में रहते हैं वह केवल क्षणभंगुर है तब यह संसार, पूरा संसार केवल एक क्षणभंगुर संसार रह जाता है। हमें यह बात समझ में आ जाती है कि हम यहां इस संसार में केवल कुछ क्षणों के लिए, कुछ दिनों के लिए और अधिक से अधिक कुछ वर्षों के लिए ही हैं , फिर हमको यहां से चले जाना है । किसी व्यक्ति ने हमारा अपमान कर दिया इससे क्या फर्क पड़ता है। क्या अंतर पड़ता है । कुछ वर्षों में तो हमारे और उसके बारे में कुछ भी तो सुनने को नहीं मिलेगा । यह मिट्टी का शरीर मिट्टी में ही मिल जाएगा । न जाने इस पृथ्वी पर कितने करोड़ लोग हम से पूर्व जीवित थे। और वह लोग भी हमारी तरह ही चिंतित और परेशान रहा करते थे । किसी व्यक्ति ने उनका अपमान किया था ।किसी व्यक्ति ने उनसे कुछ कह दिया था, अथवा  जब वे  सड़क से होकर गुजर रहे थे तो किसी व्यक्ति ने मुस्कुराते हुए उनका उपहास उड़ाया था ।जिससे उन्हें पीड़ा हुई थी, उन्हें क्रोध आया था, उन्हें चोट पहुंची थी ।पर कहां गए वह लोग ।।उनके मित्र और शत्रुओं के साथ उनका आखिर क्या हुआ । कहां गए उनके मित्र कहां गए उनके उपहास उड़ाने वाले शत्रु। जब तक वे यहां इस संसार में थे न जाने कितना हंगामा किया था । पर क्या आज वह हैं। इस संसार में क्या उनका अस्तित्व है ।_

_*बुद्ध कहते हैं कि यदि यह बात आपकी समझ में आ जाती है तो आप ज्यादा शोर-शराबा नहीं करेंगे संसार में।। आप इस संसार से बिना अधिक कोलाहल बिना शोर शराबा मचाए शांति से गुजर जाएंगे ।।बिना अधिक गंभीरता के, बिना किसी गौरव, प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाए हुए बिना अधिक कोलाहल किए इस संसार से होकर गुजर जाना ही जीवन का परम लक्ष्य होना चाहिए।। दुनिया की आपाधापी, भागदौड़ व्यर्थ है।। इतनी समझ हमें होनी चाहिए ।।*_

*आप संसार में तो रहे पर यह संसार आपके भीतर न रहे बस इतना ख्याल आपको रखना चाहिए।। आप कोई कर्म भी करे तो ऐसे जैसे कोई अभिनेता फिल्मों में एक्टिंग करता है।। इस संसार को एक सराय समझते हुए हंसते हुए यहां से विदाई लेना है बुद्धिमानी का प्रतीक होता है*

 

 

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HEAVENS (पितरलोक)

 कबीर दास एक बार स्नान करने गये वहीं पर कुछ ब्राह्मण अपने पूर्वजों को पानी दे रहे थे,

तब कबीर ने भी स्नान किया और पानी देने लगे,

 

इस पर सभी ब्राह्मण हँसने लगे और कहने लगे कि

"कबीर तू तो इन सब में विश्वास नहीं करता, हमारा विरोध करता है,"

 

और आज वही कार्य तुम भी कर रहे हो, जो हम कर रहे हैं।

 

कबीर ने कहा," नहीं, मैं तो अपने बगीचे में पानी दे रहा हूँ, "

 

कबीर की इस बात पर ब्राह्मण लोग हँसने लगे और कबीर से कहने लगे कि “कबीर जी तुम बौरा गये हो, तुम पानी इस तलाब में दे रहे हो तो बगीचे में कैसे पहुँच जायेगा?

 

कबीर ने कहा जब तुम्हारा दिया पानी इस लोक से पितरलोक चला जा सकता है तुम्हारे पूर्वजों के पास ...

 

...तो मेरा बगीचा तो इसी लोक में है तो वहाँ कैसे नहीं जा सकता है, सभी ब्राह्मणों का सिर नीचे हो गया ।

 

देना है पानी, भोजन, कपडा़ तो अपने जीवित माँ बाप को दो... उनके जाने के बाद तुम जो भी देना चाहोगे... वो उन तक तो नहीं...बल्कि पाखंडियों के घरों में पहुँचेगा ।

 

*बुद्ध से बुद्धि मिली, *

*कबीर से मिला ज्ञान*

 

*करना है करो प्यारो*

*जीते जी सम्मान*

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WE BELIEVE BUT DON'T TRUST IN GOD

A person started to walk on a rope tied between two tall towers. He was slowly walking balancing a long stick in his hands. He has his son sitting on his shoulders.

Everyone from the ground were watching him in bated breath and were very tensed. When he slowly reached the second tower every one clapped, whistled and welcomed him. They shook hands and took selfies.

He asked the crowd “do you all think I can walk back on the same rope now from this side to that side?” Crowd shouted in one voice “Yes, Yes, you can” Do you trust me he asked. They said yes, yes, we are ready to bet on you.

He said okay, can any one of you sit on my shoulder; I will take you to the other side safely

There was stunned silence. Every one became quite.

*Belief is different. Trust is different. For Trust you need total surrender. This is what we lack towards God in today’s world. *

*We believe in God. But do we trust Him. *

 

 

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ASTROLOGERS PRDICTIONS MAY NOT BE CORRECT

Once a King called astrologers of his kingdom to know the duration of his life on earth.  Many astrologers came and each one predicted good things to make the king happy and got prizes from the king. But one astrologer was sitting idle and did not say anything. The king asked why don’t you say something?  What would you say about my future? The astrologer told that according to my knowledge you will die after 10 days. The king became very sad. The Minister asked the astrologer, as per your astrology how long you are going to live. The astrologer told that I have 30 years more to live. The minister took out his sword and cut his head in one go and he died at once. The minister consoled the King that you need not worry as the predictions of this astrologer is not correct because when he can’t predict his own age how can he predict yours.

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DEATH IS INEVITABLE

A child was born to a King. The king was very happy. On his first birthday of the child, the king called many astrologers to predict the future of his son. He asked them to tell the future of the child. Each one of them predicted and praised about the bright future of child in different ways and went away with lots of gifts and prizes from the king. However, one astrologer did not say anything and was just sitting idle.

The king asked him why are you silent and don’t say anything about my son. He told that I am afraid that instead of giving me prizes you may punish me. The king said don’t be fearful and predict the future of my son. He told that I am sorry to tell you that one day this child will die. The king got annoyed for this unpleasant prediction and ordered to put him behind jail.  The Minister who was witnessing all this told the king to pardon this astrologer because others predictions might be wrong but his prediction will never be wrong as the death in inevitable. One who is borne will have to leave this world one day. So don’t punish him. The king was satisfied with the Minister’s arguments and freed the astrologer with gifts.

 

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THE WORLD IS A GREAT MIRROR

Once a dog ran into a museum where all the walls, the ceiling, the door and even the floor were made of mirror.

Seeing this the dog froze in surprise in the middle of the hall, a whole pack of dogs surrounded it from all sides, from above and below.

Just in case, the dog bared his teeth, all the reflections responded to it in the same way.

Frightened, the dog frantically barked. The reflections imitated the bark and increased it many times. The dog barked even harder and the echo was keeping up. The dog tossed from one side to another, biting the air - his reflections also tossed around snapping their teeth.

Next day in the morning, the museum security guards found the miserable dog, lifeless and surrounded by a million reflections of lifeless dogs.

There was nobody, who would make any harm to the dog. The dog died by fighting with his own reflections.

The world doesn't bring good or evil on its own. Everything that is happening around us is the reflection of our own thoughts, feelings, wishes and actions. As one plant, so does he harvest; whatever he earns, he eats.

The World is a Great Mirror.

Strike a good pose with our virtuous thoughts; compassionate feelings and good wishes for all ,virtuous actions, smile from deep within, stay positive , you will  then see - Life is really Beautiful.

 

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WHATEVER GOD DOES IS ALWAYS GOOD

Once upon a time there  was a king who was chatting with his minister and cutting  fruit with a knife. Accidently his one of the fingers got cut and resulted in bleeding. The minister expressed his grief but tried to console the king saying, whatever God does is always good. The king felt It derogative remark of the minister and in anger impissioned him.

Next day , king decided to go for hunting in the forest with his fellow men. By chance king was left behind his fellowmen in the night and caught by forest tribals. Tribals decided to sacrifice the king next day to please their deity (God). They kept the king in their custody overnight. In the morning tribals found that King had only four fingers in his left hand and therefore  was unfit for sacrifice and released king.

When king came back to his capital he told this incident to minister saying that what God does is good,  but how it was good when I put you in the jail. The Minister replied had I not been imprisoned,  I  would have gone with you and having found fit for sacrifice killed by the tribals. God is great. God always does everything for our good.. King was happy with his reply and released him from the prison.

 

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